तत्वों के संयोजन से यौगिकों का बनाना निम्नलिखित पांच मूल नियमो के अंतर्गत होता है,जिन्हें हम रासायनिक संयोग के नियम कहते हैं, आइये देखते हैं कौन- कौन से वो पांच नियम है –

रासायनिक संयोग के 5 नियम

1 . द्रव्यमान संरक्षण का नियम – ( The law of conservation of mass )

2. स्थिर अनुपात का नियम – ( Law of constant composition or law of definite proportion)

3. गुणित अनुपात का नियम – ( The law of Multiple proportion )

4. गै – लुसैक का गैसीय आयतन का नियम – (Law of Gay Lussac Gaseous Volume )

5. अवोगाद्रो का नियम – ( Avogadro’s Law )

ये पांचो रासायनिक संयोग के नियम के अंतर्गत आते है, आइये इन्हें विस्तार से समझते हैं –

1. द्रव्यमान संरक्षण का नियम – ( The law of conservation of mass )

इस नियम के अनुसार द्रव्य न तो बनाया जा सकता है, और न ही नष्ट किया जा सकता है।
( according to this rules “mass can not be created nor to be destroyed“)

इस नियम को आंतोएन लवुसीए (Antoine Lavoisier) ने सन् 1789 में दिया था। उन्होंने दहन अभिक्रियाओं का प्रायोगिक अध्ययन किये और साथ ही निष्कर्ष दिये। रसायन विज्ञान की बाद की कई कल्पनाएँ इसी पर आधारित हैं।

2. स्थिर अनुपात का नियम – ( Law of constant composition or law of definite proportion)

यह नियम फ़्रांसिसी रसायनज्ञ जोसेफ प्रउस्ट ( Joseph proust ) ने दिया था। उनके अनुसार, ” किसी यौगिक में तत्वों के द्रव्यमानों का अनुपात सदैव समान होता है “।

इन्होंने क्यूप्रिक कार्बोनेट( Cupric Carbonet ) के दो नमूनों के साथ प्रयोग किया, जिनमें से एक प्राकृतिक ( Natural ) और दूसरा संश्लेषित ( synthetic ) था। उन्होंने पाया कि इन दोनों नमूनों में तत्वों का संघटन समान था, जैसा नीचे दिया गया है।

नमूनाप्राकृतिक संश्लेषित
तांबा का प्रतिशत51:35
कार्बन का प्रतिशत9.74
ऑक्सीजन का प्रतिशत38.91

अतः स्रोतों पर निर्भर न करते हुये किसी यौगिकों में तत्व समान अनुपात में पाये जाते हैं | इस नियम को कई प्रयोगों द्वारा सत्यापित किया जा चुका है। इसे कभी – कभी निश्चित संघटन का नियम भी कहते है।

3. गुणित अनुपात का नियम – ( The law of Multiple proportion )

यह नियम डाल्टन द्वारा सन् 1803 में दिया गया | इस नियम के अनुसार, यदि दो तत्व संयोजित होकर एक से अधिक यौगिक बनाते हैं, तो एक तत्व के साथ दूसरे तत्व के संयुक्त होने वाले द्रव्यमान छोटे पूर्णाकों के अनुपात में होते हैं।

आईये उदाहरण से समझते हैं –

हाइड्रोजन ऑक्सीजन के साथ जुड़कर दो यौगिक ( Water and Hydrogen Peroxide ) बनाती है।

हाइड्रोजन (2g) + ऑक्सीजन (16g) — जल (18g)

Hydrogen (2g) + Oxygen (32g) — Hydrogen Peroxide (34g)

जहाँ ये ऑक्सीजन के द्रव्यमान (अर्थात 16g or 32g) जो हाइड्रोजन के निश्चित द्रव्यमान ( 2g ) के साथ संयुक्त होते हैं, यह एक सरल अनुपात 16 :32 या 1:2 में होते हैं।

Note – 2g,16g दिया है उसमे g का मतलब ग्राम ( Gram) को दर्शाया गया है।

4. गै – लुसैक का गैसीय आयतन का नियम – ( Law of Gay Lussac Gaseous Volume )

यह नियम गै – लुसैक द्वारा सन् 1808 में दिया गया। उन्होंने पाया कि जब रासायनिक अभिक्रियाओं में गैसें संयुक्त होती हैं या बनती हैं, तो उनके आयतन सरल अनुपात में होते हैं, बस शर्ते ये हो कि सभी गैसें समान ताप ( Definite Temprature ) और दाब ( Pressure ) पर हों।

अतः हाइड्रोजन के 100 mL ऑक्सीजन के 50 mL के साथ जुड़कर 100 mL जल वाष्प ( Water Vapour ) देते हैं।

हाइड्रोजन (100mL) + ऑक्सीजन (30mL) — जल (100mL)

अतः हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के आयतन ( जो आपस में संयुक्त, अर्थात 100 mL और 50 mL होते हैं ) आपस में सरल अनुपात 2:1 में होते हैं।

Note –

गै – लुसैक के आयतन सम्बंधों के पूर्णाक अनुपातों की खोज वास्तव में आयतन के सन्दर्भ में स्थिर अनुपात का नियम है। पहले बताया गया स्थिर अनुपात का नियम द्रव्यमान के सन्दर्भ में है। गै – लुसैक के कार्य की परिपर्ण सन् 1811 में आवोगाद्रो के द्वारा की गई।

5. अवोगाद्रो का नियम – ( Avogadro’s Law )

सन् 1811 में आवोगाद्रो ने प्रस्तावित किया कि समान ताप और दाब पर गैसों के समान आयतानों में अणुओं की संख्या समान होनी चाहिए। आवोगाद्रो ने परमाणुओं और अणुओं के बीच अन्तर की व्याख्या की, जो आज आसानी से समझ में आती है।

यदि हम हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की जल बनाने की अभिक्रिया को दुबारा देखें तो यह कह सकते हैं कि हाइड्रोजन के दो आयतन और ऑक्सीजन का एक आयतन आपस में संयुक्त होकर जल के दो आयतन देते हैं और ऑक्सीजन थोड़ी मात्रा में भी नहीं बच पाती।

यदि हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को द्वि – परमाणुक माना जाता। परन्तु उस समय डाल्टन और कई अन्य लोगों का यह मत था की एक जैसे परमाणु आपस में संयुक्त नहीं हो सकते और हाइड्रोजन या ऑक्सीजन के दो परमाणु वाले अणु उपस्थित नहीं हो सकते। अवोगाद्रो का प्रस्ताव फ़्रांसिसी में ( Journal de physidue में ) प्रकाशित हुआ। पर सही होने में बाद भी इस मत को बढ़ावा नहीं मिला।

लगभग 50 वर्ष के बाद ( सन् 1860 में ) जर्मनी ( कर्ल्सरूह ) में रसायन विज्ञान पर प्रथम अंतराष्ट्रीय सम्मलेन हुआ, ताकि कई मतों को सुलझा जा सके। उसमे केनिजारो ने रसायन – दर्शन पर विचार प्रस्तुत करते समय आवोगाद्रो के कार्य के महत्व पर बल दिया।

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